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ऐतिहासिक पृष्ठभूमि

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भारतीय पशुचिकित्सा अनुसंधान संस्थान (आई.वी.आर.आई.) इज्जतनगर की स्थापना सन् 1889 में भयंकर रोगों से भारतीय पशुधन सम्पदा के बचाव हेतु शोध कार्य करने के लिए ‘‘ इम्पीरियल बैक्टोलाॅजिकल लेबोरेटरी ’’ के रूप में हुई थी। प्रयोगशाला का नींव का पत्थर 9 दिसम्बर, 1989 में लगभग 2.2 हेक्टेयर भूमि में जो कि एक उपकारी एवं हितकारी व्यक्ति सर दिनशाव मोनाकजी द्वारा पूना में विज्ञान काॅलेज के पास दान की गई भूमि में बम्बई के तत्कालीन गवर्नर द्वारा रखा गया।

डा0 अल्फ्रेड लिंगार्ड जो कि प्रतिष्ठित मेडिकल जीवाणु विज्ञानी थे,को प्रयोगशाला का सन् 1891 में प्रभारी नियुक्त किया गया। दो वर्ष की अल्पावधि में ही जनसंख्या घनत्व वाले पूना शहर में संक्रामक रोगों के सूक्ष्म जीवों एवं विकृतिजन्य सामग्री को संभालने की गंभीरता एवं खतरे को दृष्टिपात रखते हुए यूनाइटेड सूबा में समुद्र तल से 1500 मीटर की चाई में हिमालय की कुमायूं पर्वत श्रृंखलाओं मंे घने जंगलों में स्थित मुक्तेश्वर नामक सुरम्य एवं पृथक स्थान पर प्रयोगशाला को 1893 में स्थानान्तरित /शिट कर दिया गया। लिंगार्ड में जर्मनी में जीवाणु विज्ञान का अध्ययन किया था। उन्हीं के प्रयासों से सन् 1897 में जाने-माने जीवाणु विज्ञानी डा0 रोबर्ट कोच, पीफर एवं गाफकी ने मुक्तेश्वर का ऐतिहासिक दौरा किया और रिन्डरपेस्ट नामक घातक पशुरोग की रोकथाम एवं नियन्त्रण के लिए किये जा रहे उपायों पर बेहतर सलाह दी। इसी वर्ष एन्अीरिन्डरपेस्ट सीरम के उत्पादन पर कार्य शुरू हुआ और सन् 1899 में इसका प्रथम बैच उत्पादित किया। सन् 1901 से 1906 तक के आगामी वर्षों के दौरान एन्ा्रिैक्स, हीमोरेजिक सेप्टिसीमिया एवं टिटनेस के लिए एन्टीसीरा, ब्लेक क्वार्टर के लिए एक वैक्सीन एवं अश्व गलेन्डरों के लिए एक रोग नैदानिक का उत्पादन संस्थान ने प्रारम्भ किया। मैदानों में कुछ प्रयोग करने के लिए बरेली के निकट करगैना में एक उपकेन्द्र स्थापित किया गया। सर लौनार्ड रोजर, सहायक जीवाणु विज्ञानी जो मुक्तेश्वर में चिकित्सा कार्मिक भी थे, शोध में डा0 लिंगार्ड के साथ घनिष्ठ रूप से जुड़े हुए थे। उन्होंने कोलकाता एवं लन्दन के उष्णकटिबन्धीय स्कूलों में उल्लेखनीय योगदान दिया और 1898 से 1900 तक स्थापन्न निदेशक के रूप में कार्य किया एवं बाद में भारतीय मेडिकल सेवा में वापस चले गये।

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लेिटीनेंट कर्नल जे.डी.ई. होलमस, सहायक जीवाणु विज्ञानी ने सन् 1904 में यहा कार्य शुरू किया और 1907 में प्रयोगशाला/संस्थान के मुखिया का कार्यभार संभाला। कार्य के विस्तार के लिए करगैना में उपलब्ध जमींन पर्याप्त नहीं थी। अतःउनकी सिफारिश पर इज्जतनगर के पास भारत सरकार से लगभग 306 हेक्टेयर जमींन का बड़ा प्लाॅट खरीदा गया। उनके कार्यकाल में कार्यिकीय केमिस्ट का एक पद सृजित किया गया और सर परसिवाल हार्टने को सन् 1909 में नियक्त किया गया। उन्होंने रिन्डरपेस्ट सीरम में प्रतिरक्षित पिंडों के फ्र्रैक्शन पर कार्य किया।

लेिटीनेंट कर्नल होलमस की मृत्यु के बाद मिस्टर ए. डब्लू. शिलस्टन,सहायक जीवाणु विज्ञानी के 20 मार्च, 1914 से 19 माह की अल्पावधि के लिए कार्यवाहक प्रधान के रूप में कार्यभार ग्रहण किया। उनका क्लासिकल योगदान सीरम संग्रह में वृद्धि करने केलिए प्रतिस्कन्दक के रूप में आॅक्सेलेट का प्रयोग था। इस अवधि में विकृति विज्ञानी/रोग विज्ञानीका पद सृजित किया गया और एक मेडिको डाक्टर जी. एच. के मेकअलिस्टर को 2 अक्टूबर, 1914 को नियुक्त किया गया। डा0 आर.पी. नोरिस ने शरीर क्रिया विज्ञानी केमिस्ट के पद पर कार्यभार ग्रहण किया। तीनों अधिकारियों ने ब्रिटिश आर्मी में कार्यभार ग्रहण कर लिया। डा0 ए. एल. शीथर ने इम्पीरियल जीवाणु विज्ञानी के पद पर कार्यभार ग्रहण किया और संस्थान के प्रधान का पदनाम निदेशक के रूप में परिवर्तित कर दिया गया। मिस्टर डब्लू. ए. पूल एवं टी. एम. टिमनी ने क्रमशः 30 जुलाई, 1919 एवं 15 मार्च, 1921 में संस्थान में जीवाणु विज्ञानी का कार्यभार ग्रहण किया। डा0 शीथर ने क्षयरोग, जोहन्स रोग, बोवाइन लिम्फनजिटिस के अध्ययन में योगदान दिया औरपहली बार भैंस मलेरिया पर वृत्तान्त प्रस्तुत किया।

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डा0 ए. एल. शीथर के बाद मिस्टर डब्लू.ए.पूल ने सन् 1920 में कार्यवाहक निदेशक के रूप में कार्य प्रारम्भ किया। उनकी कार्यावधि में इज्जतनगर में कार्य प्रारम्भ हुआ और और करगैना में छोटी साइट की नीलामी की गई। 19 नवम्बर, 1921 में डा0 जे.टी. एडवर्ड स्थायी निदेशक के रूप में कार्य संभाला। डा0 एडवर्ड ने पशुचिकित्सा में विविधीकरण के नये युग का सूत्रपात किया। उनकी अवधि में डा0 टी.एम. दोयले, पशुचिकित्सा अधिकारी ने पहली बार मुर्गियों की रानीखेत बीमारी पर रिपोर्ट प्रस्तुत की।

सन् 1925 में इम्पीरियल बैक्टीरियोलाॅजिकल प्रयोगशाला का नाम बदलकर इम्पीरियल भारतीय पशुचिकित्सा अनुसंधान संस्थान किया गया। डा0 एडवर्ड एवं उनके सहयोगियों के योगदानों में से सन् 1924 में खरगोश में एवं 1927 में बकरियों में रिन्डरपेस्ट विषाणु का निर्धारण पीरोप्लाॅज्मोसिस एवं थीलेरियता पर अध्ययन एवं सुर्रा की उपचार विधि में सुधार आदि सम्मिलित हैं।उन्हें पूरे देश में एक र्जावान फील्ड कार्यकर्ता माना जाता था और उन्होंने पशुओं की शवपरीक्षा पोस्टमार्टम के द्वारा प्रायोगिक आकड़ों की व्यवस्थित रिकार्डिंग की प्रक्रिया का शुभारम्भ किया। देश के विभिन्न भागों से एकत्रित किये गये सभी तरह के निरूपक व्याधिकीय नमूनों के संरक्षण कर उन्हें सुूचीबद्ध किया। पुस्तकालय की आधुनिक सुविधाओं से सुसज्जित बनाया और विश्व के महत्वपूर्ण वैज्ञानिक साहित्य की पुस्तकालय में उपलब्धता सुनिश्चितकी। उनके समय में इज्जतनगर उपकेन्द्र को शोधकेन्द्र के रूप में पूरे वर्ष व्यापक रूप से जैविकों के उत्पादन हेतु विकसित किया। आदि जन्तु विज्ञान प्रोटोजूलोजी, कृमि विज्ञान एवं जीवरसायन विज्ञान के लिए सहायक शोध अधिकारी के पदों का सृजन किया गया। मिस्टर एच. कूपर, विकृति विज्ञानी ने मुर्गियों के रानीखेत रोग का विस्तृत विवरण प्रस्तुत किया। सन् 1929 में संस्थान के निदेशक को कृषि सलाहकार के नियन्त्रण से मुक्त कर दिया। कुछ व्यक्तिगत कारणों से 31 मार्च, 1929 को डा0 एडवर्ड ने सेवा से त्यागपत्र दे दिया।

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Foundation Stone

भारत सरकार द्वारा विभागीय प्रमुख के अधिकार प्रत्योजित किये। सर फ्रंक ने डा0 एडवर्ड के स्थान पर कार्य प्रारम्भ किया। केन्द्रीय एवं प्रान्तीय सरकार के समर्थन सम्बन्धी उनकी महत्वपूर्ण सिफारिशें प्राप्त हुईं। उन्होंने राज्य के विभागों एवं इम्पीरियल कृषि अनुसंधान परिषद आइ्र्र.सी.ए.आर. के साथ घनिष्ठ सम्बन्ध स्थापित कर कार्य किया और आई.सी.ए.आई. द्वारा वित्त पोषित अनेक परियोजनाओं के द्वारा संस्थान में शोध गतिविधियों का विस्तार किया। पशुधन के विकास के लिए आवश्यक बुनियादी एवं मौलिक शोध कार्य हेतु पशुचिकित्सा विज्ञान की विभिन्न शाखाओं में विषय विशेषज्ञों की बेहतर टीम संगठित की। यह सृजनात्मक कार्य एवं ढाचागत सुविधाओं को मजबूत करने का कार्य उन्होंने राॅयल कृषि मिश्न की सिफारिशें के आधार पर किया। इसी समय इज्जतनगर-मुक्तेश्वर में एक केन्द्रीय पशुचिकित्सा महाविद्यालय शुरू करने की सर आर्थर आलवर ने एक प्रस्ताव रखा।

सन् 1931 में मुक्तेश्वर में तीन अनुभागों जैसे- व्याधिकीय विज्ञान,सीरम विज्ञान एवं प्रोटोजूआॅलोजी में शोध कार्य किया गया और पशुचिकित्सा शोध अधिकारी को प्रत्येक अनुभाग का प्रधान बनाया गया। राॅयल कृषि कमीशन की सिफारिश पर पशु पोषण, कुक्कुट शोध एवं पशु आनुवंशिकी के अनुभाग स्थापित करने की योजना बनाई गई। इज्जतनगर में संस्थान के अनुभागों के रूप में नये विभागों को स्थापित करने एवं उनके विभागाध्यक्ष के रूप में प्रभारी अधिकारी नियुक्त करने का निर्णय लिया गया। अतः सन् 1936 में इम्पीरियल इंस्टीट्यूट आॅफ वेटेरनरी रिसर्च को ‘इम्पीरियल पशुचिकित्सा शोध संस्थान’ के रूप में पुनः नामकरण किया गया। सर बेअर का प्रमुख प्रयास पशुधन के समग्र विकास के लिए नवीन प्रौद्योगिकिया उपलब्ध कराने हेतु देश में एक मजबूत संगठन का विकास करना रहा था। पशु पोषण और कुक्कुट शोध विभागों को पशु उत्पादन पर भी कार्य करने के लिए तैयार किया गया। सन् 1938 में सन् फ्रंक वेअर ने भारत सरकार में पशुपालन कमिश्नर की जिम्मेदारी संभालने हेतु निदेशक कार्यालय को छोड़ दिया।

1938-39 के दौरान मिस्टर जे. आर. हैडो ने संस्थान के कार्यवाहक निदेशक के रूप में कार्य किया लेकिन सितम्बर , 1939 से डा0 एफ.सी. माइनेट द्वारा निदेशक के रूप में कार्यभार ग्रहण करने पर डा0 हैडो को संस्थान के उपनिदेशक के पद पर वापस लौटना पड़ा। डा0 माइनेट 15 अगस्त,1947 तक संस्थान के निदेशक के पद पर रहे और बाद में उन्होंने नवीन देश पाकिस्तान का पशुपालन कमिश्नर बनने की रूचि दिखलाई। उनके महत्वपूर्ण योगदान सन् 1994 में पशु आनुवंशिकी के एक स्थायी स्कूल की स्थापना करना है और मिस्टर ए. जे. मेकडोनाल्ड द्वारा कुक्कुट पालन को और आगे बढ़ना है। डा0 माइनेट की कार्यावधि में प्रशिक्षण के नये पाठ्यक्रम प्रारम्भ हुए और शोध हेतु आई0वी0आर0आई0 की सहकारिता चालू की गई। भा0कृ0अ0प0 की शिक्षा समिति के अध्यक्ष की हैसियत से उन्होंने विभिन्न भारतीय विश्वविद्यालयों में पशुचिकित्सा विज्ञान के अध्यापन हेतु आधार तैयार किया।

स्वतन्त्रता के अरूणोदय एवं स्वतन्त्रता के पश्चात् आई0वी0आर0आई0

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15 अगस्त सन् 1947 को देश की स्वतन्त्रता के अरूणोदय पर संस्थान का पुनः नामकरण भारतीय पशुचिकित्सा अनुसंधान संस्थान के रूप में किया गया। डा0 जी0 डी0 भालेराव, लब्ध-प्रतिष्ठित परजीवी विज्ञानी ने कुछ माह की अल्पावधि के लिए संस्थान के कार्यवाहक निदेशक का कार्य संभाला। डा0 एस. दत्ता संस्थान के पहले नियमित निदेशक बने।

फरवरी 1954 में डा0 दत्ता के सेवानिवृत्त होने पर डा0 लक्ष्मी सहाय ने कार्यभार संभाला। इस अवधि के दौरान अक्टूबर, 1954 में भारत सरकार द्वारा व्यापक टीकाकरण कार्यक्रम के माध्यम से एक गहन रिंडरपेस्ट उन्मूलन योजना प्रारम्भ की गई। सन् 1957 से 1958 तक डा0 एन.डी. केहर,पोषक विज्ञानी ने कार्यवाहक निदेशक के रूप में कार्य किया। इसके बाद डी0 पी. जी. पांडेय, परजीवी विज्ञानी ने सन् 1958 में संस्थान के नियमित निदेशक का पदभार संभाला। इस अवधि में पशुविज्ञान के स्नात्तकोत्तर काॅलेज ने मास्टर आॅफ वेटेरीनरी साइन्स एम.वी.एससी. का डिग्री देना आरम्भ किया। डा0 पााण्डे की कार्यावधि के बाद डा0 एच.डी. श्रीवास्तव ने 1961-63 के दौरान स्थानापन्न निदेशक के रूप में कार्य किया।

डा0 एम0 आर0 ढांड़ा, जीवाणु विज्ञानी ने 1963 से 1966 तक आई.वी.आर.आई. के स्थानापन्न निदेशक के रूप में कार्य किया। मुक्तेश्वर की व्याधिकीय प्रयोगशालाओं एवं पशु पोषण विभाग की पोषण रोग विज्ञान प्रयोगशाला को मिलाकर इज्जतनगर में एक स्वतन्त्र व्याधिकीय विभाग बनाया गया। मुक्तेश्वर में जीवाणु एवं विषाणु विज्ञान विभाग के रूप में विभाग को नाम दिया गया।

18 जुलाई, 1966 को डा0 सी. एम. सिंह, व्याधिकीय विज्ञानी ने निदेशक के पद पर कार्यभार ग्रहण किया। वे संस्थान के सबसे युवा निदेशक थे और उन्होंने इस पर सन् 1982 में सेवानिवृत्त होने तक 16वर्ष की लम्बी अवधि तक कार्य किया। उनकी कार्यावधि में संस्थान की शोध गतिविधियों में इजाफा हुआ और पशुचिकित्सा विज्ञान के लगभग सभी क्षेत्रों/विषयों को कवर करते हुए विभागों की संख्या 7 से 22 तक पहुच गई। सन् 1972 में भारत के तत्कालीन राष्टपति श्री वी.वी.गिरि ने विशाल माडुलर प्रयोगशाला की नींव रखी। महान भविष्यदृष्टा डा0 सिंह ने शोध, शिक्षा और प्रसार की गतिविधियों में वृद्धि की और एक ही स्थान पर या एक ही छत के नीचे पशुस्वास्थ्य, उत्पादन एवं प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में अनुपम सुविधाएं मुहैया कराई। उनके कुशल नेतृत्व में ही संस्थान को भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद का राष्टीय संस्थान का दर्जा प्राप्त हुआ। भारतीय पशुचिकित्सा अनुसंधान संस्थान क एक नवीन परिसर की स्थापना बंगलौर 1972 में की गई। इसके अतिरिक्त श्रीनगर 1973,कोलकाता1970, एवं पालमपुर 1959 में क्षेत्रीय केन्द्र भी स्थापित किये गये।

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डा0 बी0 एस0 राज्या, व्याधिकीय रोग विज्ञानी 1982 से 1984 तक संस्थान के कार्यवाहक निदेशक रहे। सन् 1983 में विश्वविद्यालय अनुदान आयोग द्वारा संस्थान को मानद् विश्वविद्यालय का दर्जा दिया गया। मई,1984 में डा0 पी0 एन0 भट्ट, आनुवंशिकी विज्ञ ने नियमित निदेशक के रूप में कार्यभार ग्रहण किया। डा0 पी0एन0भट्ट के निर्देशन में शोध एवं शिक्षण की गतिविधियां और तेज हो गईं। राष्टीय जैवप्रौद्योगिकी केन्द्र की स्थापना हुई। शोध, प्रसार एवं शिक्षण सम्बन्धी गतिविधियों के अनुवीक्षण हेतु क्रमशःसंयुक्त निदेशक शोध, संयुक्त निदेशक प्रसार एवं संयुक्त निदेशक शैक्षणिक के पद सृजित किये गये। सन् 1990-1992 के दौरान डा0 पी0एन0 भट्ट को भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद मुख्यालय में स्थानान्तरित कर दिया गया। इस अवधि में डा0 बी0बी0 मलिक ने कार्यवाहक निदेशक के रूप में कार्य किया।

अगस्त, 1991 में संस्थान में डा0 पी0 एन0 भट्ट द्वारा पुनः कार्यभार ग्रहण करने से पूर्व डा0 ओ0एन0 कुंजरू ने सन् 1991 में 5माह के लिए स्थानापन्न निदेशक के रूप मंें कार्य किया। इसके बाद मई, 1992 में डा0 डी0 एस0 बालेन ने निदेशक का कार्यभार संभाला। डा0 बी0बी0 मलिक ने कुछ माह के लिए कार्यवाहक निदेशक का कार्य किया। डा0 जी0सी0 मोहन्ती जाने-माने व्याधिकीय रोग विज्ञानी ने अपनी सेवानिवृत्ति नवम्बर,1995 तक कार्यवाहक निदेशक के रूप में कार्य किया। सन् 1995 में नियमित निदेशक के रूप में डा0 किरन सिंह के कार्यभार ग्रहण करने से पूर्व डा0 पी0एन0 खन्ना ने चार सप्ताह की अल्पावधि के लिए निदेशक का कार्यभार संभाला। सन् 1007 में डा0 किरन सिंह के बाद डा0 ओ0एस0तोमर ने निदेशक का कार्यभार संभाला। अप्रैल 1999 में डा0 नागेन्द्र शर्मा ने कार्यवाहक निदेशक के रूप में कार्यभार ग्रहण किया और मई, 2000 तक इस पद पर कार्य किया। डा0 एम0पी0यादव, जीवाणु विज्ञानी ने 17 मई, 2000 को संस्थान के नियमित निदेशक के रूप में कार्यभार संभाला और 28 मार्च, 2006 तक लगातार इसी पद पर कार्य किया। उनके कार्यकाल मे शीतोष्ण पशुपालन विभाग स्थापित किया गया, पशु प्रायोगिक स्टेशन,येलंका,बेंगलूर में एफएमडी वैक्सीन गुणवत्ता नियन्त्रण के लिए पी2 की सुविधा विकसित की गई, इज्जतनगर में किसान किसान काॅल सेंन्टर एवं डग एवं रसायन अवशिष्टों पर एनआरएल की स्थापना की गई और विश्वविद्यालय सह प्रशासनिक खण्ड का कार्य पूरा हुआ। डा0 नेम सिंह, संयुक्त निदेशक शेध ने 26 मार्च,2006 से 20 नवम्बर, 2006 तक स्थानापन्न निदेशक के रूप में कार्य किया।

डा0 एस.पी.एस. अहलावत ने 21 नवम्बर, 2006 को संस्थान के निदेश्क के रूप में कार्यभार ग्रहण किया और 17 फरवरी, 2009 को निदेशक का पद छोड़ा। डा0 आर. एस.चैहान, संयुक्त निदेशक (कैडराड) ने कार्यवाहक निदेशक के रूप में डा0 अहलावत से कार्यभार लिया और 19 अप्रैल, 2009 को डा0 धर्मेश्वर दास, संयुक्त निदेशक (शैक्षणिक) के कार्यवाहक निदेशक की हैसियत से कार्यभार संभाला।

प्रो0 महेश चन्द्र शर्मा ने 14 सितम्बर, 2009 को नियमित निदेशक के रूप में कार्यभार ग्रहण किया।

वर्ष महत्वपूर्ण ऐतिहासिक घटना
1889 महाराष्ट के पूना शहर में इम्पीरियल जीवाणु विज्ञान प्रयोगशला (आई.बी.एल)की स्थापना ।
1890 डा0 अल्फे्रड लिंगार्ड, जाने-माने मेडिकल वैज्ञानिक की संस्थापक निदेशके के रूप में नियुक्त।
1893 उत्तर-प्रदेश् (अब उत्तरासण्ड में) की कुमायू पर्वत श्रृंखलाओं में स्थित मुक्तेश्वर में आई बी एल का स्थानान्तरण।
1897 लब्ध-प्रतिष्ठित जीवाणु विज्ञानी डा0 रोबट कोच, डा0 आर.पीफर और जी. गाकी का मुक्तेश्वर परिसर का ऐतिहासिक दौरा ।
1899 रिंडरपेस्ट रोधी सीरम के प्रथम बैच का उत्पादन।
1913 इज्जतनगर परिसर की नींव।
1925 इम्पीरियल इंस्टीट्यूट आफ वेटरिनरी रिसर्च के रूप में नामकरण।
1930 इम्पीरियल वेटेरिनरी रिसर्च इंस्टीट्यूट (आई.वी.आर.आई.) के रूप में नवीन नामकरण ।
1940 मुर्गियों के रानीखेत रोग के लिए वैक्सीन का विकास ।
1947 संस्थान के मुख्यालय का मुक्तेश्वर में इज्जतनगर स्थानान्तरण और भारत सरकारके अधीन भारतीय पशुचिकित्सा अनुसंधान संस्थान के रूप में पुनःनामकरण
1958 आगरा विश्वविद्यालय से सम्बद्ध मुक्तेश्वर मंे स्नात्तकोत्तर पशुचिकित्सा महाविद्यालय की स्थापना।
1966 भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद के प्रशसनिक नियन्त्रण में संस्थान किया गया और राष्टीय संस्थान का दर्जा दिया गया।
1967 पालमपुर (हि0प्र0) में क्षेत्रीय केन्द्र की स्थापना ।
1970 कलकत्ता (बाद में कोलकाता) में क्षेत्रीय केन्द्र की स्थापना
1971 बंगलौर में आई.वी.आर.आई. परिसर की स्थापना।
1973 किरणित लंगवर्म वैक्सीन का विकास एवं श्रीनगर में वैक्सीन उत्पादन केन्द्र की स्थापना।
1982 इज्जतनगर में जनित्रद्रव्य की स्थापना।
1983 विश्वविद्यालय अनुदान आयोग द्वारा भा0प0चि0अ0सं0, इज्जतनगर को मानद विश्वविद्यालय का दर्जा प्रदान करना।
1986 इज्जतनगर में राष्ट्रीय जैवप्रौद्योगिकी केन्द्र (एन.बी.सी.) की स्थापना।
1998 भोपाल में उच्च सुरक्षा पशुरोग प्रयोगशला की स्थापना।
2000 उच्च सुरक्षा पशुरोग प्रयोगशला राष्ट्र को समर्पित।
2001 रिंडरपेस्ट हेतु ओ आई ई द्वारा अनुमोदित एवं आई ए एच पियरब्राइट, ब्रिटेन द्वारा मान्यता प्राप्त स्पर्धी -इलिसा रोग नैदानिक किट का विकास।
2002 सजीव संशेधित पीपीआर वैक्सीन का विकास।
2004 इज्जतनगर में किसान कॉल सेंटर की स्थापना।
2004 विश्वविद्यालय सह प्रशसनिक खण्ड का उद्घाटन।
2005 कैडराड को अंतरराष्ट्रीय प्रमाण पत्र सर्विस एश्यिा द्वारा आई एस ओ 9001:2000 प्रमाण पत्र प्रदान करना।
2007 वीडियो कान्फ्रेंस सुविधा की शुरूआत।
2007 मुक्तेश्वर परिसर में किसान हेल्पलाईन की शुरूआत।
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